Checkdam

चैक डैम –
आपने बड़े-बड़े बाँधो के बारे में सुना होगा जो अपनी विशाल संरचना, लागत, और आकृति के लिए प्रसिद्ध होंगे। हमने भी जंगल में कुछ छोटे-छोटे बाँध बनाए है लेकिन वे उनकी संरचना या आकृति के लिए नहीं बल्कि उनकी मुख्य विशेषताओं (जिनके लिए प्रसिद्ध है) के कारण उपयोग किये गए है।

जंगल में बाँध बनाने का तरीका जितना पारंपरिक है उतना ही सतत भी है। बाँध का निर्माण जंगल में पहले से ही उपस्थित पत्थर, घास, और मिट्टी से किया है।

अब आप सोच रहे होंगे कि जंगल में इस तरह के बाँधो की क्या आवश्यकता रही होगी?
तो हम आपको बता दें कि इनके द्वारा वर्षा जल के प्रवाह को कम किया जाता है जिससे सम्पूर्ण जल का कुछ अंश संरक्षित हो सकें। यह संरक्षित जल मिट्टी में रिस कर नमी को और भू-जल स्तर को बढ़ाता है। मिट्टी में नमी के बढ़ने के कारण आस-पास स्थित पौधों की वृद्धि बढ़ जाती है जिनकी जड़े विकसित होकर मृदा अपरदन की समस्या को कम करती है।
जंगल के बाँधो की विशेषताएँ यहीं नहीं खत्म होती इसके अलावा संरक्षित जल, जंगल के दूसरे सदस्यों जैसे यहाँ रहने वाले जानवरों की प्यास बुझाने के भी काम आता है।

Earthen Pots

यह मिट्टी के घड़ों और गेड़ का मिश्रित स्वरूप है। जिसका उपयोग सिंचाई तकनीक के रूप में उपयोग किया जाता है। गेड़ का उपयोग पारंपरिक रूप में कुँए से पानी निकालने के लिए किया जाता था, लेकिन जंगल में उपयोग में आने वाले गेड़ की बनावट इस प्रकार की है की वे गेड़ से भिन्नता दर्शाते है। क्या आपको पता है जंगल में उपयोग में आने वाले भूमिगत घड़े गेड़ के समान दिखने के बावजूद भी भिन्न क्यों है?

इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी छिपी हुई है। जंगल जैसी विशाल जगह में सभी पौधों को हर दिन पानी पिलाना कोई आसान काम नहीं है। हमारे पर्यावरण प्रेमी स्वयंसेवक ने जंगल में पौधों की सिंचाई के लिए गेड़ लगाने का सुझाव दिया, गेड़ का प्रयोग जंगल में किया गया लेकिन इसकी पानी के तेजी से रिसाव के कारण ये कारगर साबित नहीं हुए। शायद आपको पता हो आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है। कुछ ऐसा ही आविष्कार हमारे पर्यावरण प्रेमी स्वयंसेवक ने किया, उन्होंने आगे रह कर गेड़ की संरचना में बदलाव करवाया, बदले हुए गेड़ में पानी का रिसाव धीरे-धीरे होने लगा जिससे की जंगल के पौधों को लगभग 7-8 दिन तक पानी उपलब्ध हो सके।

Mulching

आज कल हर काम के लिये कोई न कोई तकनीक मिल जाती हैं। अब आप सोचिये कि पौधों के रखरखाव के लिये कोई तकनीक हो सकती हैं। जी हाँ बिल्कुल, ऐसी कई तकनीकें हैं जिन को इस्तेमाल कर आप अपने पौधों को बड़ा कर सकते हो। पलवार पौधों के रखरखाव की एक सरल और अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीक है।

इस तकनीक में घास व खरपतवार से मिट्टी के ऊपरी हिस्से के पदार्थों के लिए एक रक्षा कवच बनाया जाता है। यह कवच प्राकृतिक (कार्बनिक) या मानव कृत (अकार्बनिक) पदार्थों से मिलकर बनता है।

कार्बनिक पदार्थों जैसे कटी हुई घास, सूखे पत्ते, पेड़ो की छाल आदि।
अकार्बनिक पदार्थों जैसे कटे हुए पत्थर, रेत, प्लास्टिक की परत हो सकती है।
लेकिन हमने जंगल के लिये कार्बनिक पलवार के उपयोग को महत्व दिया है क्योंकि कार्बनिक पदार्थों की परत मिट्टी की परिस्थिति को अच्छा बनाती है, जो केचुओं या अन्य जीवों को अपघटन के लिए आवश्यक वातावरण प्रदान करती है जिससे अपघटित आसानी से हो जाता है।

अब इस अपघटन से होता क्या हैं?
अपघटित हुए पोषक पदार्थ मिट्टी में रिस जाते है और मिट्टी की उर्वरता बढ़ा देते हैं। मिट्टी की यही उर्वरता पौधों में जड़ों की वृद्धि, पानी छानना, और मिट्टी की जलधारण क्षमता को बढ़ाती है। पलवार तकनीक के रूप में बस यहीं तक अपना कमाल नहीं दिखाती बल्कि और भी कई कमाल पलवार के द्वारा किया जाताहोतें हैं ।

यह मिट्टी के कटाव को रोकती है, साथ ही भारी वर्षा के प्रभाव को काम करती हैं। मिट्टी में नमी को बनाये रखती है जो बार-बार पानी देने की जरूरत को कम करती है। मिट्टी के तापमान को नियंत्रित करती है और खरपतवार की वृद्धि को रोकती है।

Organic Fertilizer

जैविक उर्वरक –

जंगल धीरे धीरे आत्म निर्वाह की तरफ़ बढ़ता जा रहा है। इस दौरान,जंगल में काम आने वाली आवश्यकताओं ने हमें कई कौशल सिखाये है। जैसा की आपको पता है, जंगल में स्वयंसेवकों द्वारा पौधा रोपण किया जाता है, उन स्वयंसेवकों ने भी हमारे साथ यह सब सीखा है। इसका एक उदाहरण है कि, पौधों का रोपण करते समय पौधों को बाह्य तौर से पोषक पदार्थ प्रदान करने के लिए उसमे मिट्टी के साथ जैविक उर्वरक डाला जाता है।

हम आपको बताना ही भूल गए की जंगल में हम जैविक उर्वरक बनाते हैं और आपको यह भी नहीं बताया कि इसको कैसे तैयार करते है?

जैविक उर्वरक बनाने के लिए हमने जंगल में तीन पक्के गड्ढे बनाये हुए है। जैविक उर्वरक बनाने के लिए हम पेड़ पौधों कीकटाई छटाई के अवशेष, सड़े हुए या पुराने ट्री गार्ड, जंगल से निकाले गए खरपतवार या घास का उपयोग किया जाता है।
सभी सामग्री को थ्रेसर की सहायता से छोटे छोटे टुकड़ो में काटा जाता है। फिर उसे पक्के गड्ढो में डाला जाता है। जैविकउर्वरक बनाने के लिए बस इतना ही पर्याप्त नहीं है। गड्ढो में पड़ी सामग्री को समय समय पर पानी से गीला किया जाता हैजिससे उसमें अपघटक बैक्टीरिआ अपनी संख्या में वृद्धि करतें हैं। ये बैक्टीरिया सामग्री को शीघ्रता से अपघटित करते है। यह समय लगभग 3 महीने का होता है। जैविक उर्वरक का काला रंग उसके तैयार होने की पुष्टि करता है।

Propogation

पेड़ पौधे प्रकृति में अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए अपने समान संतति उत्पन्न करते है जो कि विभिन्न तरीकों से संपन्न होता है। जंगल की पौधशाला में भी नए पौधे तैयार किये जाते हैं लेकिन यहाँ पौधे तैयार करने की प्रक्रिया पूर्ण रूप से प्राकृतिक नहीनहीं है।
मुख्य रूप से यहाँ दो तरीको से नए पौधे तैयार किये जाते है। पहले तरीके में बीजों का उपयोग किया जाता है जिसमें उन्हें थैलियों में उगाने से पहले अनुकूल वातावरण में अंकुरित किये जाते है। अंकुरण के पश्चात तैयार छोटे पौधों को थैलियों में स्थानांतरित कर दिया जाता है।

पौधे तैयार करने की दूसरी तकनीक में पौधे के किसी भाग जैसे टहनी, तना आदि को काटकर उससे नए पौधे तैयार किये जाते है, इस तकनीक के द्वारा पौधा गुणों में अपने पैतृक पौधे से समानता दर्शाता है। पौधों के लिए यह संतति उत्पन्न करने का तरीका है जबकि बागवान (गार्डनर ) के लिए यह कला है।

Tree Guard

पौध रक्षक- आपको पता ही होगा कि जिस प्रकार मानव शरीर के आंतरिक भाग की रक्षा के लिये मांस एक सुरक्षा गार्ड के रूप में काम करता हैं, ठीक उसी प्रकार पौधों की रक्षा के लिये पौध रक्षक होते हैं, और बाँस से बने पौध रक्षकों का तो कोई जवाब नहीं। आइये इन्हीं बाँस के पौध रक्षकों के बारे में हम आपको कुछ रोचक बातें बताते हैं-

बाँस के पौध रक्षकों का प्रयोग पोधो को बाहरी कारको जैसे आँधी, तूफान, अतिवृष्टि, जानवरों आदि से सुरक्षित रखने का यह एक इको फ्रेंडली तरीका है। इसका प्रयोग हम जंगल में भी करते हैं, क्योंकि जब दीमकों का आक्रमण हो तो लड़ाई में पौधों से पहले ये भाग ले सकें, बाँस के सेलुलोस से अपना पेट लें और पौधों पर आक्रमण ना करें। सबसे दिलचस्प बात यह हैं कि यदि बाँस के पौध-रक्षक ख़राब हो जाते हैं तो उन्हें उर्वरक निर्मित करने की सामग्री के रूप में किया जा सकता हैं।

वैसे तो इको- फ्रेंडली होना ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है लेकिन इसके पीछे विज्ञानीय महत्व का दांव-पेंच भी छुपा हुआ है। क्या आपको पता हैं, बांस के पौध-रक्षक बंद होते हैं, जिससे पौधों की वृद्धि तेजी से होती हैं । अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्यूँ होता हैं., लोतो हम आपको बता ही देते हैं कि आखिर ऐसा क्यूँ होता हैं। तो अधिकांश पौधे प्रकाश की ओर गति कर के अपना भोजन बनाने की दर को बढ़ा लेते हैं, जो पौधे के बढ़ने में भी मदद करता हैं । अगर धूप केवल ऊपर से ही मिलती है, पौधा, उस धूप की तरफ अपने को बढाता है। सूर्य के अधिक ताप से बांस के पौध रक्षक गर्म नहीं होते है, जिससे पौधों में विकसित हुई नई पत्तियाँ और जड़ों को कोई नुकसान नहीं पहुँचता है।

इंग्लैंड जैसे देशों में, इस काम के लिए प्लास्टिक के पाइप का उपयोग किया जाता है। पादप विशेषज्ञों के अनुसार इसके कई लाभ बताये गये जिसमें पेड़ का शीघ्रता से सीधा व लम्बा हो जाना भी एक हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें ऐसा खास क्या है जब यह सुझाव उदयपुर पहुँचा तो बाँस की टोकरी से प्रेरित होकर प्लास्टिक को बाँस से बदल दिया गया और इस प्रकार जंगल के पौधों के लिए बाँस के ट्री गार्ड का जन्म/उदगम हुआ।